कल्पतरु : एक अनंत वृक्ष🌿
- Aarna 🌼

- Jul 17, 2020
- 2 min read
कुछ दिनों पहले जब गांव जाना हुआ था, तब एक मनमोहक वृक्ष पर नज़रें जा रुकीं थीं। ननिहाल होने की वजह से, वहां सब से लाड-प्यार ही मिला था। मेरी एक आवाज़ पर, मामाजी ने 4 सेवकों से कह कर उस वृक्ष की कलम मेरे लिए निकलवा ली। उन्होंने ही मेरे घर के पीछे, उस कलम को पौधे का रूप लेने तक, उसकी देख रेख की। जब वह पौधा मेरे संभालने लायक हो गया था, तब मामा वापिस गांव लौट गए। जाते जाते मामा ने कहा था -"अब तुम इस बागवानी करने के लिए बिल्कुल तैयार हो गुड़िया, खूब खुश रहो। "

मेरी नानी अक्सर हम बेटियों को किसी पौधे की "कली" कह कर बुलाया करतीं थीं। जिज्ञासावश एक दिन मैं पूछ बैठी, की आप मुझे आम या इमली का वृक्ष क्यूं नहीं कहती? आस पास के नौकर हंस रहे थे, नानी ने बड़े प्यार से मुझे अपने पास बिठाया और कहा, "मेरी नन्ही सी इमलि की कली, अभी तुम मासूम, नाज़ुक तथा कोमल हो। अगर बागवान पूरी मेहनत और लगन के साथ उसे सींचता है तो कली से ही आगे चलकर वृक्ष बनती है। वृक्ष विशाल होता है, अपने इर्द गिर्द की मुश्किलों का सामना डट कर करता है, कई तूफान आते हैं, कीड़े भी लग जाते हैं, पर वृक्ष जीवित रहता है, और आसरा देता है जरूरतमंद को। जो कभी एक चिड़िया होगी, या एक मुसाफिर, वृक्ष भेदभाव नहीं करता। वह बस अपना काम करता रहता है।" मैं फिर बोलने लगी "क्या मैं भी ऐसा ही एक रूप लेने वाली हूं?" नानी ने कहा - "हां, बिल्कुल"।
पर मामा की बातों से एहसास हुआ की नानी मां की वह नन्ही कलियां अब बागवान हो चुकीं हैं। अपने जीवन की। यह बागवानी ताउम्र चलती रहेगी। कभी अपनी कामनाओं कि कटाई करना, कभी बंजर सी ज़मीन को आंसुओं से उपजाऊ बना उस पर खुशबूदार फूल उगाना और कभी कभी लहलहाती फसलों के बीच बैठ दिन दुनिया से परे हो जाना। जैसे कभी लकड़ी की राख को खाद के रूप में उपयोग करना आवश्यक हो जाता है, वैसे ही कई बार हमें अपनी टूटी हुई उम्मीदों से प्रेरणा लेकर आगे बढ़ना पड़ता है ताकि हम कुछ बेहतर हासिल कर सकें। मन एक कल्पवृक्ष है, इसकी मांग अंतहीन है। अगर आप किसी एक फ़िज़ूल कि डाली को नहीं हटाएंगे तो कई और डालियां निकल आएंगी। तब आप पाएंगे की कितना मुश्किल होता है किसी अंकुरित विचार की डाली को दिशा देना, ठीक वैसे ही जैसे किसी बीज के लिए होता है। पर याद रखें, मुश्किल है नामुमकिन नहीं। हर पेशे से कुछ ऐसी ही सीख जुड़ी होती है, जैसे बागवानी से हम सीख सकते है अपनी भावनाओं तथा इच्छाओं को सही रूप में बड़ा होने देने की कला। और इसी तरह भी हम अपने मन रूपी कल्पतरु में सृजन कर सकेंगे एक निरंतर बढ़ने वाली, ज्ञान की ललक रखने वाली डाली का, जो सबसे ज़्यादा मोह लेने वाली होगी।🌼










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