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कहना ज़रूरी है🍂

बीती कुछ रोज़ से मन ज़रा भरा सा था, कई दिनों से नानाजी से जी भर कर बातें भी नहीं की थी, तो सोचा थोड़ी देर बैठ आती हूं। मैं जा पहुंची उनके कमरे में और देखा की नानाजी बड़े गौर से अपने मोबाईल पर कुछ देख रहे हैं, उन्होंने ज्यों ही मुझे देखा, मुझे बुला कर कहा -"यह वीडियो फोन लगा रहा था तेरी बड़ी मां को,पर जा ही नहीं रहा, देख तो क्या हुआ है" मैंने देखा और जो गड़बड़ी थी उसे ठीक कर कॉल लगा उन्हें फोन लौटा दिया, पल भर के लिए नानाजी झिझके और फिर उन्होने कॉल काट दिया, कहने लगे -"बेटा, एक काम कर तू मुझे अच्छे से सीखा दे कि वीडियो फोन कैसे करते हैं, ताकि अगली बार पूछना न पड़े।" मैंने वैसा ही किया जैसा ननाजी ने कहा। जब तक बड़ी मम्मी से नानाजी बात कर रहे थे, मैं वहीं थी। एक पिता अपनी बेटी से जो बातें करता है बिल्कुल वही बातें हुई, कुछ भी असाधारण नहीं था। क्रमशः अपनी 6 बेटियों से जिनमें से एक मेरी मां भी थी, नानाजी ने बात की और अंततः जब उन्होंने फोन रखा, तो कहने लगे "एक और ज़रूरी काम निपट गया"। मैं पूछ बैठी की इस वार्ता में ज़रूरी क्या था? नानू ने कहा - "जो बातें मैंने अपनी बेटियों से कि वह नहीं, बल्कि मैंने जो अपने होने का अहसास उन्हें दिलाया वह ज़रूरी था। मेरी भावनाओं का उन तक पहुंचना ज़रूरी था।" ऐसा कह कर नानू अपनी सांझ की सैर को निकल गए। उनसे मैं फिर बात ना कर सकी, पर उन्होंने कुछ बहुत बड़ा सिखाया था आज। जब हम थोड़े परेशान होते हैं और किसी विश्वासपात्र व्यक्ति से अपनी परेशानी साझा करते हैं, तो हमें उनसे कोई अज्ञात सलाह प्राप्त नहीं होती, वह कुछ ऐसी सलाह या सराहना होती है जो हमने भूत में किसी और को दी होती है या कहीं ना कहीं , निश्चित तौर पर सुनी ही होती है, जैसे - "सब ठीक हो जाएगा", "यह दिन बीत जाने हैं"," तुम बेहद शक्तिशाली हो" इत्यादि। पर फिर भी हमें बेहतर महसूस होता है। सोचा है क्यूं? क्योंकि मानव प्रवित्ती है,सोची हुई बातों से ज़्यादा सुनी या देखी हुई बातें गंभीरता से उत्कीर्ण रहती हैं। इस किस्से को समझिएगा - बचपन में जब कभी खेलते वक़्त चोट लगती थी, तो मां आकर प्यार से सहलाते हुए कहती की परी आकर तुम्हारा दर्द ले जाएगी, और मैं मान जाया करती थी। यकीन मानिए, अगली सुबह तक सच में चोट में आराम होता था। वह बात अलग है कि हम थोड़ी अटेंशन पाने के लिए २-४ दिन तक पट्टी बांध कर रखते थे। कई बार चुप रहना लाज़मी होता है, पर नानाजी से आज सीखा की सिर्फ कुछ कह देने से, कितना कुछ बदल जाता है। अपनी नाराज़गी ज़ाहिर करने के लिये हो या प्रेम का इज़हार करने के लिए, कहना ज़रूरी है। किसी को प्रोत्साहित करने के लिए या किसी के निंदनीय कृत्य की आलोचना करने के लिए आपका कुछ कहना ज़रूरी है। अपने अधिकारों के लिए लड़ते हुए कुछ कहना उतना ही ज़रूरी है जितना किसी के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करने के लिए आपका कुछ कहना । मेरा इतना कुछ कहने के पीछे मूल सार यह है कि पूरे ब्रम्हांड की शक्ति समाई है आपमें। आप अपने शब्दों के इस्तेमाल से किसी को बना भी सकते हैं और किसी को ऐसी उपहति भी पहुंचा सकते है जिससे वह ज़िन्दगी भर उभर ना सके, बस यही एक मामला है जिसमें आपके कुछ कहने से बेहतर होगा कुछ ना कहना बाकी तो आप आज़ाद भारत में हैं, अपनी सोच व्यक्त करने का जन्मसिद्ध अधिकार है आपको, इसीलिए इन्हें दूसरों की सोच तले मत कैद कीजिएगा। एक ही ज़िन्दगी मिली है हमें, हर ख्वाहिश अभी ही पूरी करनी है, हर भाव इसी जन्म में व्यक्त करना है और सबसे ज़रूरी इस जीवन को पूरी तरह जीना है काटना नहीं है।संभवतः आपके जीवन के किसी अंश से प्रेरित हो भविष्य में लोग कहें की कहना ज़रूरी है।✨


 
 
 

4 Comments


Aarna 🌼
Aarna 🌼
Jun 09, 2020

Thank youuuuuu very much Bhai❤️

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Rittwik Das
Rittwik Das
Jun 09, 2020

Bohot sundar 💓💓, God bless this budding writer 💓💓💓

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Aarna 🌼
Aarna 🌼
Jun 09, 2020

True that..🙏✨

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Anvesh Mishra
Anvesh Mishra
Jun 09, 2020

It's all just about the experiences that makes life beautiful ❤️

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